संजय यादव पर जिम्मेदारी का भोझ अधिक होने के कारण उन्होंने ज्यादा ध्यान पढ़ाई मे न दे कर खेती मे ही दिया। उनका परिवार खेती में ही आश्रित है परिवार का भरण पोषण खेती से ही होता है। लगभग एक दशक तक पारंपरिक खेती करने के बाद, बिहार के किसान संजय यादव ने लगातार कम होते मुनाफे और मौसम की अनिश्चितता को महसूस किया। पारम्परिक विधि से खेती करने मे उनको ज्यादा मजदूरों की ज़रूरत पड़ती थी मगर सही समय से मजदूर ने मिल पाने के कारण उनकी फसल देरी से लगती थी इस वजह से उनको ज्यादा मुनाफा नहीं हो पता था। पारम्परिक विधि से खेती करने मे बीज, पानी, एवं खाद की मात्रा भी ज्यादा लगती थी जैसे फसल की लागत काफी ज्यादा बढ़ जाती थी साथ ही साथ जलवायु में हो रहे परिवंतान से जैसे कभी ज्यादा बारिश और कभी कम से भी उनको काफी परेशानी का सामना करना पड़ता था।
